दो चचेरी बहनों की मस्त चुदाई
एक दूसरे के पास बैठी दो चचेरी बहनें, उनका समय अप्रत्याशित ढंग से बदल गया।
एक बार फिर मैंने उस पल को याद किया। दोनों चचेरी बहनें थीं, साथ में स्नानागार में। ख़ुशी थी, तब हम धीरे-धीरे भीतर गए। जब सभी थक चुके थे, एक अलग तरह की छुअपन शुरू हुई। वहाँ की गर्मी, आवाज़ें, हरकतें - सब कुछ बदल गया। अंत में मैंने ऐसा किया जिसके बारे में कभी नहीं सोचा था।.
एक बार फिर होली के दिन लकी मेरे सामने बैठा था। उसने शुरू किया एक ऐसी घटना से, जहाँ वो दो लड़कियों के साथ था। रंगों के बीच बातें गरम हो गई थीं। धीरे-धीरे सब कुछ आगे बढ़ गया।.
पहले हिस्से में कहानी धीमे-धीमे बढ़ती है। एक अजनबी चीज़ से तनाव घटने लगता है। छोटे हरकतों पर शरीर जवाब देने लगता है। ठंडक या गर्माहट का असर स्पष्ट होता है। आवाज़ें पीछे रह जाती हैं। हर स्पर्श कुछ नया खोलता है।
थकावट भरे पलों के बाद हम तीनों चुपचाप लेट गए थे। इसके बाद क्या हुआ, वो मैं अभी सुनाता हूँ। फिर धीरे-धीरे सोनू उठा, बाथरूम की ओर बढ़ा। मैं पीछे-पीछे चल दिया। वहाँ जाकर कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी।
थोड़ी देर के बाद मैं धीरे से उठा। तीन बीयर के मग में अनार का रस डाल दिया। एक प्लेट में सूखे मेवे भुनाकर रख दिए।.
थोड़ा खाना-पीना हुआ, तब मन अच्छा होने लगा।.
अब तुम्हारा गुस्सा निकल जाए, मेरी जान। ऐसी लड़की तुम पहली नहीं हो जिसने ये सब किया। कई तो गर्भ रोकथाम की गोलियों के असर से बचने के लिए चूत के बजाय गुदा में झंझरी डालवाना चुनती हैं। पिंकू की बात ही कुछ और है, उसकी दोनों सीलें तो हमने बहुत पहले तोड़ दी थी। अभी भी वो इस गुदा चढ़ाई के अनुभव में फंसी रहती है - कुछ उत्तेजना, कुछ दर्द, कुछ बेबसी। मीठे-खट्टे एहसासों के बीच खोई सोनू को समझाने की कोशिश कर रहा था। .
कभी-कभी मेरा दिमाग सेक्स के बारे में नहीं चलता।
अब तक सोनू की नज़रें मुझ पर ठहरी हुई थीं, गुस्सा साफ़ झलक रहा था।.
मुझे याद आया कि कैसे वो मदद करता रहा, धीरे-धीरे कमर पर हलचल होने लगी। बस, हंसी छूट गई। अब तो घड़ी खुद शीशे से कहानी सुनाएगी, क्योंकि प्रयोग अभी शुरू होना है।
सुर के साथ पिंकू की आवाज़ भी धीमे से जुड़ गई।.
थोड़ा थका हुआ था मैं, उस तगड़े सत्र के बाद।.
अचानक पिंकू ने मेरी हिचकिचाहट देख ली। उसने झूठा गुस्सा करते हुए जोर से कहा – अरे लकी, इतने चतुर बनने की क्या जरूरत? तुम्हारी बारी छूट गई, अब क्या पांसे नहीं डालोगे? पहले पांसे फेंक दो!
हल्की सी मुस्कान सोनू के होंठों पर तैरकर गुज़र गई।
मैंने पासा उछाला, कोई हिचकिचाहट नहीं थी।.
अचानक मुझे दोनों पासों पर सवाल का निशान दिखा।.
अब मैं पूरी तरह उनके भाग्य पर छोड़ा हुआ था। किसी ने बस इशारा किया, तो वे मेरे किसी अंग को छूकर जो चाहें कर सकती थीं।.
अच्छा, फिर क्या चाहिए? मैंने खुद इस खेल की शुरुआत की थी।.
थोड़ी देर बातें करने के बाद पिंकू ने मेरा लंड चूसने का ऑफर लिया। वहीं सोनू की नजर उभरे हुए निप्पल्स पर पड़ी।.
इधर-उधर की बातचीत के बाद, सोनू ने मेरे निप्पल पर हल्के से होंठ रख दिए। वहीं, पिंकू लंड और ट्टटों पर अपना ध्यान लगाए हुए था।.
हल्का सा दबाव बढ़ने लगा, मुंह के कोनों से छूटता हुआ। एक तरफ घिसावट, दूसरी ओर सन्नाटा। अभी तक कोई चूसने वाला इशारा नहीं हुआ था। फिर सोनू ने अपने होंठ आगे झुकाए, नीचे खिंचे, मेरे निपल पर ठहर गए।.
फिर भी, जब मैं सोचता कि अब वो चूसेगी, तभी वो मुँह हटा लेती। उसकी शरारती मुस्कान के साथ दूसरे निप्पल पर ध्यान जाता।
इस तरह के शरारतभरे अंदाज को देख मैं खुशी महसूस कर रहा था। वहीं, मेरे छाती के छोरे बेचैनी से झुल रहे थे, सोनू के मुँह के पास पहुँचने को आतुर।.
वो फिर से अपने ढंग से बदला चुकाने लगी, मीठे-मीठे छेड़छाड़ के ज़रिए। ऊपर की ओर पिंकू धीरे-धीरे मेरे लंड व पोतों पर हुनर दिखा रही थी।.
मेरा लौड़ा उसके होंठों के छेड़छाड़ में ऐसे खड़ा हो गया, मानो कोई सख्त छड़ हो। जब उसे एहसास हुआ कि मैं उफनने वाला हूँ, तो उसने अपने मुँह से पीछे हट लिया। इसके बाद उसकी उंगलियाँ मेरे लंड की जड़ पर आ टिकीं - अंगूठा ऊपर, तर्जनी नीचे - और तगड़ा दबाव डाला।.
मेरी स्थिति पूरी तरह बदसंधि में आ चुकी थी।.
शरीर से बाहर निकलने को तैयार था मेरा लंड, उतना ही खिंचे थे निपल्स।.
मेरे होंठों से बिना सोचे ‘आह उफ्फ् शह्ह्…’ की ध्वनि छूट गई।
अब डेमो मिल सकता है। पिंकू बोला, सोनू की गांड में चढ़े दृश्य के बाद अपनी जगह खुजली समेटे रहने के इंतजार में था वो कई घंटों से। .
उसने मुझे तैयार कर लिया था। एक नई लंबी दौड़ के लिए।.
मैं हल्के से हँस पड़ा, बोला - "अच्छाई करो, फिर देखो।" इतना कहकर सीधे पीठवाली कुर्सी पर जा बैठा।.
बैठते ही पिंकू ने मेरे सामने जगह ले ली। धीमे-धीमे उसका हाथ मेरे लौड़े पर फिरने लगा।.
लंड पर जीभ फिरा दी। थूक से नम होता वो मुँह में आया।
बहुत देर तक प्यार जताने के बाद उसने मेरे लौड़े पर भरपूर लार छोड़ी। फिर पलटकर मेरे लंड को अपनी गांड में धीमे-धीमे उतारा। सीने पर पीठ घिसते हुए वो धीरे-धीरे नीचे की ओर बैठती गई।.
आईने में दिख रहा था कि उसके चेहरे पर दर्द की जगह एक अजीब सी शांति है... ऐसा लग रहा था, मानो किसी बोझ से छुटकारा मिल गया हो।
ऐसा लगा मानो किसी ने लंड को मखमल के कपड़े में ढक दिया हो। अब तक गीली चूतों की चुदाई से, जहाँ कामरस की फुहार आ रही थी, इस सूखी मखमली सुरंग में ताजगी सी घुल रही थी।.
थोड़ी देर पहले ही सोनू की गांड की सील टूटी थी। फिर भी, अंदर जैली मिला खून का गीलापन था। पिंकू ने आस्ते-आस्ते मेरे लौड़े पर ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया। कुछ करने की जरूरत नहीं महसूस हो रही थी। वह मखमली सुरंग के भीतर, मेरे सांप को मसलती जा रही थी।.
कभी पिंकू मेरे लंड को दबाकर इधर-उधर हिला देती। कभी धीमे स्पंदन में आगे-पीछे खिसक जाती। कभी उसकी नली मेरे मूसल के चारों ओर छुपी लय में घूमने लगती। कभी वह अपनी ओखली से मेरे ऊपर कुटाई करने लगती, बिना कोई शोर किए।.
उसके पूरे शरीर में बेचैनी थी, मानो कहीं अंदर से खुजली छिड़ रही हो। मेरा लंड उसके स्पर्श में आते ही वो ठिठक गया, जैसे किसी तनाव को छूकर जवाब दे रहा हो।.
पीछे से हाथ आगे बढ़ाया मैंने, पिंकू की चूत में उंगली डालकर जांच की। अंदर तब तक कामरस का पानी बह रहा था।.
थोड़ी देर में मेरी उंगलियाँ उसकी कामकणिका पर घूमने लगीं। इस बीच चूत में भी गहराई तक जाने लगी एक झनझनाहट।
उसके पास जाकर तुम्हें भी अंदाज़ा होगा, पीछे से धक्का देने पर भी उसकी सांसें तेज हो जाती थीं। मैंने आँखों से इशारा किया सोनू की ओर, फिर बिना कुछ कहे उसकी उंगलियों को पिंकू के अंदर ठूंस दिया।.
अचानक सोनू की नजर मुझ पर पड़ी। फिर बिना कुछ कहे वो पिंकू की ओर मुड़ गई। उसकी आंखों में सवाल था, जो धीमे-धीमे बदलता रहा। कभी मैं था उसके घूरने का केंद्र, तो कभी पिंकू। हर झलक में एक अथर्य छुपा था।
जब मैंने सोनू का मुँह पिंकू की चूत पर दबाया, तो वो खुद-ब-खुद आगे बढ़ी। पिंकू की क्लिटोरिस उसने चूस ली। अपनी जीभ से चूत में घुसने लगी वो।.
उस पल पिंकू सांस लेने में भी तड़प रहा था।
आह, उफ्फ, श्हह्ह – मुँह से ऐसी आवाज़ें निकलती रहीं, झटके लगातार आते रहे। पीछे से छाती को छूते हुए मैं चूचियों पर हथेलियों का दबाव डाल रहा था, वहीं उसके हाथ सिर्फ सोनू के सिर पर घूम रहे थे, ज्यादा कुछ नहीं।.
पीछे से जकड़े हुए थे मैंने उसे कसकर, तभी भी वह इतना झटका देने लगी कि पकड़ में रखना मुश्किल हो गया।.
लग रहा था कहीं मेरे लंड पर कोई खतरा न पड़ जाए।.
जब सोनू आगे बढ़कर कुछ करने वाली थी, तभी पिंकू ने उसका एक स्तन मुँह में ले लिया। उसकी ऊँगली धीमे-धीमे अंदर घुस गई। इससे वो थोड़ी शांत हुई। मैंने चुपचाप आराम महसूस किया।.
मैंने खुद ही सोनू के दूसरे चूचुक की ओर मुँह बढ़ाया, और उसे धीरे से चूस लिया। एक चूचुक पर आदमी के होंठ, तो दूसरे पर इस्त्री की जीभ का स्पर्श - एक साथ दोनों का अहसास। बीच में चूत में उंगली का घूमना…आह…अब तो सोनू क्या महसूस कर रही थी, किसे पता!
हाथों में पिंकू के दूध के कटोरे थे, सोनू का निप्प मुँह में था, और लंड पर मखमली छुअन जारी थी। इतने में पांचों उंगलियों में घी का एहसास आया, सिर पर कढ़ाई-सी लगी।.
खुशी का यह पल ज्यादा न टिका। कुछ ही समय में पिंकू लड़खाते हुए आई, सोनू पर झपट गई। उसने उसे इतना जोर से भींचा कि हग-हग की आवाज़ आने लगी। सोनू की ओर से मेरी तरफ एक शर्माती मुस्कान छूट गई। मैंने उसके नरम गालों को धीरे से खींचा, फिर घर आए बच्चे की तरह एक लंबा चुंबन ले लिया।.
अचानक दिमाग में कुछ चला, मैंने फौरन उठकर खड़े होने का फैसला किया। पिंकू की गांड में मेरा लौड़ा घुसा रहा। छोटे कद की वजह से उसके पैर हवा में झूल गए। ऐसे में वो मेरे ऊपर बैठती जा रही थी।.
बैठते-बैठे मैंने सोनू की तरफ देखा। पिंकू की पेंसिल हील वाली सैंडल लाकर उसे देने की बात कही।
पैर में ऊँची चप्पलें डालते ही, पिंकू का संतुलन ठीक हो गया।.
पैरों पर घूमते हुए मैंने उसकी चूचियाँ थोड़ा सा दबोच लिया।
थोड़ा आगे झुकाकर वह घोड़ी पर सवार होने का अभिनय करता। एक हाथ से चूचुक पकड़ता, जैसे लगाम हो। जिस तरफ मोड़ना होता, उस ओर के निप्पल को खींच लेता। कभी बाएं, कभी दाहिने। ऐसे चलता रहता, बिना रुके।.
उसके पैरों के धीमे-धीमे चलने से मेरा लंबा लोहा उसकी गर्म जगह में घिसने लगा। मैंने तुरंत पटरी पर धुन बजा दी। इसी बीच हम थिरकने भी लगे, बिना एक कपड़ा छूए।.
पीछे की ओर झुकी, पिंकू मस्ती से लबरेज थी। हर बार सीधी होती, उसकी पीठ मेरे सीने से चिपक जाती।.
पिंकू के अंदर लौड़ा घुसा होने के बावजूद, सोनू उसे ऐसे मज़े लेते देख आश्चर्य से ताक रही थी। अभी-अभी फटी गांड का दर्द, धमक शायद अब तक पूरा नहीं उतरा था।.
उसके होंठ मेरे से जुड़ गए, मैंने सोनू को पास खींचा।
एक के पीछे हाथ घुमाते हुए मज़े लेने लगा… वहीं दूसरी के मुँह में जीभ घुसाकर झूमने लगा। तीनों मिलकर एक धड़कन सा लगे, और आवाज़ के साथ लंबे वक्त तक ऐसे हिलते रहे, जैसे अलग शरीर न हों।.
मेरे वश में रहना, अब संभव नहीं दिख रहा था।.
मैंने भी ऊपर की ओर झटका महसूस किया, साथ ही एक तेज 'आह उईईई' की ध्वनि निकल पड़ी।.
तीनों को एक ही मंजिल पर गिरने में ज्यादा समय नहीं लगा। घंटों के बाद, धीमे-धीमे होश में आया मैं, और पलकें उठाकर पिंकू को झुका देखा।.
एक-एक बूँद के तौर पर वीर्य पीछे के छेद से निकल रहा था।.
हवा में धुंध सी छाने लगी थी।.
सुबह के अँधेरे में, पैरों के निशान फर्श पर छोड़ता हुआ, मैं वापस बाथरूम की ओर बढ़ गया।.
आवाज़ सुनकर दोनों तितलियों की आँखें खुल गईं। वे समय झांककर देखते हुए उठ बैठीं। ‘शौचालय का समय…’
खबर सुनाते ही मैं उन्हें लगभग घसीटकर बाथरूम की ओर ले गया।.
पहले तो शौचालय का पैनल चालू किया। फिर हम ने एक-दूसरे की त्वचा पर साबुन लगाना शुरू कर दिया।.
उनमें से एक ने दूसरे की पीठ पर साबुन रखा। छाति पर भी हाथ फेरा गया। गुप्तांगों तक साबु की पहुँच हुई।.
एक शरारत मन में आई, तो पीछे जाकर सोनू की पीठ पर हाथ फेर दिए। धीरे से आगे की ओर बढ़ा, चूचियों को छू लिया, चूत पर भी हथेली घुमा दी। पीछे क्या रहती पिंकू, वो भी तुरंत मौके पर टूट पड़ी।.
उसने पीछे खड़े होकर अपनी छातियों से धीरे-धीरे मेरी पीठ रगड़ना शुरू कर दिया।.
इतने में सोनू की पीठ पर झाग फैल रहा था, धीरे से आगे की ओर झुका दिया। अब उसके नितंबों पर साबुन लगाना शुरू कर दिया गया।.
इसके बाद वो धीमें-धीमें उसकी पिछवाड़ी में अपनी उंगली ले गया।.
थोड़ी देर में हाथ फिसला, तभी एक उंगली से शुरू करके धीमे-धीमे दो डाल दी। जब तक खिंचाव महसूस हुआ, तब तक भीतर और गहराई तक जाने लगा।.
सोनू के दिमाग में उलझन थी। क्या जवाब देना चाहिए, इसका पता नहीं था। हर संभावना अटपटी लग रही थी। कुछ भी सही नज़र नहीं आया।
असल में, इतना ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं था।.
हम तो हमेशा से हर बार संबंध बनाने से पहले और बाद में एक-दूसरे को नहलाते आए हैं।
उंगलियों पर झागदार जेल लगाकर, धीमे से एक-एक कर तीन तक पहुँच गया।.
जब मैंने उसकी पीठ को छूते हुए धीमे हाथ से दबाव डाला, तो उसकी जांघें थोड़ी ढीली पड़ गई। मैंने अपना हाथ नीचे सरकाया, और बिना रुके, अपने शरीर के घटने के साथ आगे बढ़ गया। एक झटके में वह ऊपर उठी, आवाज़ उसके गले से टूटी - 'ऊईइई... आआह...' उसकी सांस फूल गई, आँखें बंद, सिर पीछे झुका।.
पर इतना साबुन डालने के बाद, धीमे-धीमे मालिश करने से उसके अंदर का रास्ता नरम और फैला हुआ हो गया। मेरा लंड आसानी से भीतर चला गया, बिना किसी रुकावट के। ऊंचाई में लड़की छोटी होती है, यह तय है, चाहे कद में मझोली हो। वह पैरों के घुटने मोड़कर ऊपर उठी, फिर भी मेरे लंड पर ठीक से नहीं बैठ पाई। .
उसके शरीर के भार से ही मेरा लौड़ा पूरी तरह सोनू की गांड में चला गया। पिंकू, जो सोनू की गांड पर मेरी बाथरूम की ऐसी हरकतों से सचेत थी, झट से आगे बढ़ी। वो बीच में आकर सोनू को दबोच लिया, फिर हम तीनों एक-दूसरे से चिपक गए।.
हाथ फैलाया, और झट से गर्म पानी को ठंडे में बदल दिया।.
पानी के छींटे पड़ते ही तीनों को झुरझुरी सी आई। उत्साह भी अचानक बढ़ गया। निपल्स पर सर्दी का असर था, साथ में तनाव भी। चारों निपल्स को मैं धीरे-धीरे चाट रहा था। कभी इकट्ठे तो कभी अलग-अलग घिस रहा था।.
पीछे की ओर सोनू की पीठ मेरे सामने थी। नीचे से मेरा डंडा धीरे-धीरे उसकी गांड में जा रहा था।.
फिर पिंकू ने हाथ आगे बढ़ाया, मेरे निपल्स को छूते हुए उसकी साँस तेज हो गई। सोनू का चेहरा देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वो कितना घबरा गया था।.
उसकी उँगलियाँ पिंकू के कंधों पर आराम कर रही थीं। गाल धीमेपन से उसके बालों में छुपा हुआ था।.
जब मैं पैर के बल खड़े-खड़े थक जाता, तभी एड़ियों के फर्श से छूते ही मेरा लौड़ा गहराई में चला जाता।.
पैरों के बल वापस ऊपर हट गया ताकि वह टकराने से बच जाए।
शरीर पर ऊपर-नीचे हिलने के बाद वो झटके में खुला।.
तीन बार गिर चुकने के बाद फिर से हलचल होने पर लौड़ा जैसे मना कर रहा था। धीरे-धीरे सब कुछ बाहर निकाला गया। एक के बाद एक वो दोनों उसे चूसकर गिराने लगीं।.
थोड़ा थोड़ा करके पिंकू मुझे नखरे से दबा रही थी।
सोनू की मुस्कान ने सब कुछ बदल दिया। वो ऐसे मुस्कुराया, जैसे कोई शरारत छुपी हो। उसके होंठों पर मेरी तमन्ना थी। माफी का एहसास धीरे-धीरे दिल में उतर गया। आखिरकार, मैंने खुद को उसके सामने खो दिया।.
मत रुको! पिंकू की आवाज़ तेज़ हो गई। सोनू के मुँह पर मुँह लगा, धीमे-धीमे अंदर तक खींच लिया।.
एक दूसरे के होठों पर झलकती जीभें सरकती रहीं, फिर धीमे-धीमे अंदर तक। आखिरकार, मेरे माल का बँटवारा हुआ - उन्होंने हर छोटी चीज़ खपा ली।.
अब हमने धीरे से तौलिये से शरीर पोंछा। कपड़े डाले। फिर अलग-अलग रास्ते चल दिए। कल जो आएगा, वह रविवार है।.
कल सुबह तक मैं सोता रहूँगा। एक-दो पेग स्कॉच के आज खींच लिए हैं, पूरे दिन बस यही करने वाला हूँ।.
कल शाम को मैं नेटफ्लिक्स पर एक ऐसी फिल्म चुनूंगा जिसमें डर छिपा हो। सोमवार का पहला घंटा ऑफिस की तरफ कदम बढ़ाएगा।.
उनमें से हर कोई अपने-अपने काम में लगी रहेगी।.
अगले सप्ताह कुछ होता है या नहीं, वक्त बताएगा।.
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